वैदिक संस्कृति

यह लेख वैदिक संस्कृति के बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए है। इसमें वैदिक संस्कृति का इतिहास विशेषताएं समाजिक आर्थिक जीवन के बारे में जानकारी व अन्य महत्व बिन्दू शामिल है।

सिन्धु संस्कृति के पतन के पश्चात भारत में जिस नवीन संस्कृति का विकास हुआ उसे वैदिक संस्कृति या वैदिक काल के नाम से जाना जाता है। वैदिक काल को दो भागों में बांटा जा सकता है

  1. ऋग्वैदिक काल(1500 ई. पू.-1000 ई. पू.)
  2. उत्तर वैदिक काल(1000  ई. पू.-600 ई. पू.)

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के अतरंजीखेड़ा नामक स्थान से प्राप्त लोहे के साक्षी के आधार पर वैदिक काल को दो भागों में बांटा गया है.

वैदिक काल की जानकारी के स्रोत-

  • वैदिक काल की जानकारी के स्रोत वैदिक साहित्य हैं, जिनके अंतर्गत वेद ब्राम्हण ग्रंथ आरण्यक व उपनिषद आता है.
  • वैदिक शब्द धातु से बना है जिसका अर्थ जानना या ज्ञान होता है.
  • यह ज्ञान वैदिक ऋषियों को आत्मसाक्षात्कार के द्वारा प्राप्त हुआ इसलिए वेदों को अपौरुषेय कहा जाता है।
  • अपौरुषेय-इसकी रचना किसी व्यक्ति ने नही की अपितु यह ईश्वर की कृति है अर्थात दैवीय है।
  • वैदिक ऋषियों को लिपि का ज्ञान नही था इसलिए वे वैदिक ज्ञान को पीढी दर पीढी कंटस्थ करा कर आगे बढाये। इसलिए वैदिक साहित्य को श्रुति भी कहा जाता है।
  • वैदिक संस्कृति ग्रामीण थी।
  • शुरु में इसका प्रसार संपूर्ण उत्तर भारत(आर्यावत) में था। बाद में ऋषि अगस्त द्वारा इस संस्कृति का प्रसार दक्षिण भारत में किया गया।

वैदिक काल उत्पत्तिकर्ता

  • वैदिक संस्कृति का अन्य नाम ऋग्वेदिक संस्कृति है। वैदिक साहित्य की रचना का श्रेय आर्यो को दिया जाता है।
  • आर्यो के मूल स्थान को लेकर इतिहासकारो में मतभेद हैं। कुुछ का मानना है कि आर्यो का मूल निवास स्थान भारत में था कुछ का मानना है कि आर्या का मूल निवास स्थान भारत के बाहर था।
वैदिक संस्कृति के अंतर्गत दो श्रोतो को सम्मिलित किया जाता हैः
  • पुरातात्विक स्त्रोतः इसके अंतर्गत अभिलेख एवं मृदभांड आते है।
  • साहित्यिक स्त्रोत: इसके अंतर्गत वैदिक साहित्य आता है।

A. अभिलेख

  • दो अभिलेखो के माध्यम से हमे वैदिक काल की जानकारी प्राप्त होती है।
  • एशिया माइनर अभिलेख(बोगाज़कोई का अभिलेख) 1400 ई.पू. : इस अभिलेख में चार वैदिक देवताओं इंद्र, वरुण, मित्र, नासत्य(अश्विन) का उल्लेख मिलता है.
  • कस्सी का अभिलेख(ईरान से प्राप्त)1600 ई.पू. : इस अभिलेख में यह उल्लेख मिलता है कि ईरान आर्यों की एक शाखा भारत की तरफ गई थी.

B. मृदभांड(बर्तन)

  • विभिन्न प्रकार के मृदभांड के आधार पर हमें वैदिक काल की जानकारी प्राप्त होती है.
  • जैसे:  वैदिक काल में गुरुवाणी मृदभांड का प्रयोग किया जाता था तथा उत्तर वैदिक काल में चित्र धूसर मृदभांड का.
  • पोलीस मृदभांड: नवपाषाण काल
  • लाल मृदभांड पर काले रंग की आकृति: हड़प्पा सभ्यता
  • लाल व काले मृदभांड: ताम्र पाषाण काल
  • गैरिक/गुरुवणी मृदभांड: रिग वैदिक काल
  • चित्र धूसर मृदभांड: उत्तर वैदिक काल
  • उत्तरी कृष्ण मार्जित मृदभांड: 6 वी शताब्दी ई.पू.

वैदिक साहित्य:

वैदिक साहित्य के अंतर्गत वेद, ब्राम्हण ग्रथ, आरण्यक व उपनिषद आता है।

A. वेदः

  • यह सूक्तो, प्रार्थनाओ, स्तुतियो, मंत्र तंत्रो तथा यज्ञ संबंधी सूत्रों का संग्रह है। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी इसके संकलनकर्ता है।
  • वेदों को संहिता भी कहा जाता है क्योकि यह वेदव्यास जी द्वारा संकलित किया जाता है।
  • वेदों की सांख्या चार हैः
  1. ऋग्वेद: यह सूक्तो का संग्रह है.
  2. यजुर्वेद: यज्ञ संबंधी सूक्तो का संग्रह.
  3. सामवेद: गीतों का संग्रह जिसके अधिकांश गीत ऋग्वेद से लिए गए हैं.
  4. अथर्ववेद: मंत्र तंत्र, जादू टोना संबंधी मंत्रों का संग्रह.

B. ब्राह्मण ग्रंथ:

  • वेदों को जनमानस तक सरल व सुबोध तरीके से पहुंचाने हेतु इसका संकलन किया गया.
  • यह गद्य  रूप में  है
  • प्रत्येक वेद का अपना एक ब्राह्मण ग्रंथ होता है-ऐतरेय, तैत्तिरी, मैत्रायणी,शंखायन, तलवकार तथा बृहदारण्यक

C. आरण्यक:,

  • वनों में रचित जाने के कारण इन्हें आरण्यक कहा जाता है.
  • इसमें दार्शनिक और रहस्यवादी सिद्धांत दिए गए हैं.
  • वर्तमान में उपलब्ध 7 प्रमुख अरण्य है.

D. उपनिषद:

  • भारतीय दार्शनिक विचारों का प्राचीनतम संग्रह है.
  • इसे भारतीय दर्शन का स्त्रोत अथवा पिता माना जाता है.
  • इसकी विषय वस्तु आत्मा और ब्रह्म के अवैध संबंध को बताना है.
  • इसमें कर्मकांड की अपेक्षा ज्ञान मार्ग पर बल दिया गया.
  • मुक्तिका उपनिषद के अनुसार उपनिषदों की कुल संख्या 108 है. जो वेदों से संबंधित हैं.
  • छांदोग्य उपनिषद प्राचीनतम उपनिषद है बृहदरायणकठोपनिषद सबसे बड़ा उपनिषद है. जबकि ईशावास्योपनिषद सबसे छोटा उपनिषद है
वेद भाग ब्राह्मण ग्रंथ आरण्यक उपनिषद/वेदांत पुरोहित उपवेद
1. ऋग्वेद
  1. शाकल
  2. बालखिल्य
  3. वाषकल
ऐतरेय
कौषीतकी
ऐतरेय
कौषीतकी
ऐतरेय
कौषीतकी
होता आयुर्वेद
2. सामवेद
  1. कोथुम
  2. राणायनीय
  3. जैमनीय
जैमनीय छान्दोग्य,जैमनीय छान्दोग्य,जैमनीय, केन उदगाता गंधर्व वेद
3. यजुर्वेद
  1. शुक्ल
  2. कृष्ण
शतपथ
मैत्रायणी
तैतरीय
मैत्रायणी
तैतरीय
बृहदरायण

कठोपनिषद

 

अध्वर्यु धनुर्वेद
4. अथर्ववेद
  1. पिप्पलाद
  2. शौनक
गोपथ माण्डुक्योपनिषद

मुण्डकोपनिषद

ब्रह्मा शिल्पवेद

वेद व उनकी विशेषताएं:

  • इसमें विभिन्न देवताओं की स्तुति /प्रार्थना मे गाये गए मंत्रों का संग्रह है.
  • इसकी रचना सप्त सेंधव प्रदेश में हुई.
  • इसका संकलन महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास द्वारा किया गया.
  • ऋग्वेद सबसे प्राचीनतम वेद है.
  • इसके अंतर्गत10 मंडल,1028 सूक्त है.
  • प्रत्येक मंत्र अग्नि देवता की उपासना से आरंभ होता है
  • 10 मंडलों में2 तथा 7 मंडल सबसे प्राचीन है, जिसे ऋषि मंडल, वंश मंडल/गोत्र मंडल कहा जाता है
  • 1,8,9 तथा10 वे मंडल बाद में जोड़ा गया

ऋग्वेद: महत्वपूर्ण तथ्य

  • इसके चतुर्थ मंडल में निम्नलिखित बातों का उल्लेख किया गया है।
  1. इस मंडल के 57 वे सूक्त में कृषि के लिए 24 मंत्रों का उल्लेख किया गया है।
  2. इसमें तीन राजाओं ( तासदस्यु ,अजमीढ, पुरमीढ) के द्वारा 3 मंत्र की रचना की गई।
  • 10वें मंडल में चार्तुवर्ण व्यवस्था (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र ) का प्रथम बार उल्लेख है। इसके नासदीय सुक्त में पृथ्वी/सृष्टि के उत्पत्ति का उल्लेख है।
  • ऋग्वेद के दो ब्राम्हण ऐतरेय व कौशितिकी है।

ऐतरेय ब्राम्हण

इसकी रचना महिदास ने अपनी माता इतरा के नाम पर किया। इसमें निम्नलिखित बातों का उल्लेख हैं-

  • राजा की उत्पत्ति का सिद्धान्त
  • समुद्र का उल्लेख एक विशाल जलराशि के रुप में
  • पुत्रियों को दुखो का कारण बताया गया
  • जन शब्द का उल्लेख-275 बार
  • शुनः शेप का आख्यान
  • प्रज्ञान ब्रह्म का उल्लेख

यजुर्वेद 

  • यजु का अर्थ यज्ञ होता है। इसमे यज्ञ की विधियों का प्रतिपादन किया गया है।
  • इसमें यज्ञ बलि संबंधि मंत्रो का वर्णन है। यह गघ व पघ दोनो में लिखा गया है।
  • इसमें 40 अध्याय व 1990 मंत्र है।
  • इसके दो प्रधान रुप है- शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेय संहिता) तथा कृष्ण यजुर्वेद।

शतपथब्राम्हण (रचनाकार महर्षि याज्ञवल्क्य)

यह सबसे प्राचीन व सबसे बडा ब्राम्हण ग्रंथ है।इसमें वैदिक संस्कृति के पूर्व दिशा में प्रसार की सूचना मिलती है।

बृहदाण्यक उपनिषद

यह सबसे बडा उपनिषद है। इसकी रचना याज्ञवल्क्य व गार्गी संवाद का उल्लेख मिलता है।

तैत्तरीय उपनिषद

इसमे अधिक अन्न उपजाओं का नारा दिया गया है” अन्त वहुकुर्वीत तद्वृतम”। इसमे अन्न को ब्रम्ह कहा गया है व अतिथि देवो भवः का उल्लेख है।

जबालो उपनिषद

इसमें सर्वप्रथम 4 आश्रमों का उल्लेख किया गया है।

इशोवास्योपनिषद

निष्काम कर्म का सिद्धांत

सामवेद

  • साम का अर्थ गान से है।
  • सर्वप्रथम इसका संकलन जैमनीय ऋषि द्वारा किया गया। इसके पश्चात सुकर्मा ने अपना योगदान दिया।
  • इसमें यज्ञ में आहुती करते समय गाये गये मंत्रो के उच्चारण का उल्लेख हैं।
  • सामवेद के अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लिये गये है इसलिए इसे ऋग्वेद का अभिन्न अंग माना जाता है।
  • भारतीय संगीत के सप्तस्वरों की जानकारी मिलती है। इसलिए इसे भारतीय संगीत का जनक माना जाता है।
  • इसे उदगाता ने सबसे पहले गाया।
  • इसकी 3 शाखायें हैंA 1कौथुम, 2 राणायनीय, 3जैमिनीय

अथर्ववेद

  • इसका संकलन दो ऋषियों – अथर्वा ऋषि व अंग्रिस ऋषि द्वारा किया गया। इसलिए इसे अथर्वागिरस वेद भी कहा जाता है।
  • यह सबसे लोकप्रिय श्रेष्ठ व सबसे छोटा वेद है।
  • इसमें सांसारिक विषय वस्तुओं-जादू-टोना, भूत- प्रेत, वशीकरण विभिन्न औषधियाँ इत्यादि का उल्लेख हैं।

ऋग्वेद कालीन सामाजिक व्यवस्था

  • ऋगवैदिक कालीन समाज जनजातिय व्यवस्था पर आधारित था।
  • समाज पितृयत्तात्मक था। पिता की सम्पत्ति का पुत्र ही उत्तराधिकारी होता था। परन्तु नारी का भी माता के रुप में पर्याप्त सम्मान था।
  • समाज में वर्ण व्यवस्था की शुरुआत (पुरुष सूक्त) जो पेशे पर आधारित थी।
  • स्त्रियों का विवाह व्यस्क हो जाने पर किया जाता था। उन्हे शिक्षा का अधिकार व राजनीति व युद्ध में भाग लेने का भी अधिकार था।
  • समाज में बाल-विवाह, सती प्रथा ,परदा प्रथा का प्रचलन नही था।
  • ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में पुरुष चारों वर्णो की उत्पत्ति का वर्णन साथ ही शूद्र शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख भी मिलता है।
  • वैश्य शब्द का प्रयोग भी पुरुष सूक्त में हुआ है। शेष ग्रंथ में विश शब्द मिलता है।

ऋग्वेदिक कालीन आर्थिक जीवन

  • लोगो का मूल आधार पशुपालन व कृषि था।
  • पशुओं की गणना रथि (संपति) के रुप में की गई।
  • सर्वाधिक महत्वपूर्ण पशु गाय थी। जिसे मुद्रा की भाँति समझा जाता था।गाय को अष्टकर्णी व अवन्ध्या कहा गया था।
  • दूसरा महत्वपूर्ण पशु घोडा था।
  • इस काल में एकमात्र फसल यव का उल्लेख हुआ है।
  • व्यापार वस्तु विनिमय द्वारा होता था।
  • उघोग व व्यापार अविकसित थे।
  • इस काल में प्रजा राजा को स्वेच्छा से जो अंश देती थी उसको बली कहा गया है।
  • इस काल में नमक व कपास का उल्लेख नही हुआ है।

ऋग्वेद कालीन राजनीतिक व्यवस्था:

  • ऋग्वैदिक काल में ग्राम सबसे छोटी इकाई थी तथा जन सर्वोच्च इकाई थी।
  • जन का प्रमुख (राजा) सभा-समिति विदथ गण जैसी लोकतात्रिक संस्थाओं के सलाह पर कार्य करता था।
  • राजा का पद आनुवांशिक हो चुका था।
  • राजा(गोप) कबीले का संरक्षक तथा पुराभेत्ता होता था।
  • ऋग्वेद के आठवें मंडल में परुष्णी(रावी) नदी के तट पर लडे गये दशराज युद्ध का वर्णन है। यह युद्ध भरत वंश के राजा सुदास तथा अन्य राजाओं के समूह के बीच हुआ।
  • 10 राजाओं का नेतृत्व पुरु जन का राजा कर रहा था।

ऋग्वेदिक कालीन धार्मिक जीवन 

  • वैदिक कालीन आर्य विश्व बन्धुत्व और मानवतावादी दृष्टिकोण से परिचालित थे। वे मूर्ति पूजक नही थे अपितु प्राकृतिक शक्तियों का देवीयकरण कर उनकी उपासना करते थे।
  • कबीलाई ढांचा बहुदेववादी के साथ एकेश्वरवादी भी था। इस समय मनुष्य ऐहलौकिक सुखों अर्थात भौतिक सुखों पर बल देते थे।
    यास्क के अनुसार ऋग्वैदिक आर्यो के देवताओं की तीन श्रेणियँा थी।
    1आकाश के देवता – सूर्य, घौस, वरुण, मित्र, पूषन ,अदिति, उषा, अश्विन
    2 अन्तरिक्ष के देवता – इन्द्र, रुद्र, मरुत, वायु, पर्जन्य
    3 पृथ्वी के देवता – पृथ्वी, अग्नि, सोम, बृहस्पति

उत्तर वैदिक कालीन सामाजिक जीवन-

  • इस काल में वर्ण व्यवस्था में कठोरता आने लगी तथा वर्ण व्यवस्था कर्म के स्थान पर जन्म आधारित हो गई।
  • समाज स्पष्ट चार वर्णो में विभक्त हो गया था- ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य शूद्र
  • स्त्रियों के अधिकार में गिरावट आई।
  • मैत्रायणी संहिता में स्त्री को पासा एवं सुरा के साथ तीन प्रमुख बुराइयों में गिना गया है।
  • सभा व समिति में स्त्रियों के प्रवेश को वर्जित कर दिया गया।
  • इस काल में गौत्र व्यवस्था की शुरुआत हुई।

विविध महत्वपूर्ण तथ्य-

  • इतिहास पुराण का पंचमवेद कहा गया- छांदोग्य उपनिषद में
  • यम-नचिकेता संवाद- कठोपनिषद में
  • याज्ञवल्क्य- गार्गी संवाद का उल्लेख- वृहदारण्यक उपनिषद
  • वैश्य शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग-वाजसनेयी संहिता में
  • पुनर्जन्म का सिद्धान्त- शतपथ ब्राम्हण
  • आरुणि उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद -छांदोग्य उपनिषद में
  • निष्काम कर्म सिद्धान्त का सर्वप्रथम प्रतिपादन हुआ- इशोपनिषद
  • शून्य का उल्लेख हुआ- मुंडक उपनिषद
  • पुत्र को संसार सागर पार करने वाली नौका कहा गया -ऐतरेय ब्राम्हण
  • अधिक अन्न उत्पन्न करना चाहिए नारा दिया – तैतिरिय उपनिषद
  • युद्ध का प्रारंभ मनुष्यों के मस्तिष्क से होता है। कथन उल्लेखित है- अथर्ववेद

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